Wednesday, December 19, 2012

बलात्कार

मैंने कभी नहीं सुना या पढ़ा कि जानवर बलात्कार करते है. ये सब "शुभ" कार्य , सिर्फ हम इंसान ही करते है . शर्म आती है मुझे . क्या हम जानवरों से भी गए गुजरे है . हमारी मानसिकता कितनी घृणित हो चुकी है . हैरत की बात ये है की उत्तर भारत में ये ज्यादा हो रहे है . समस्या कुछ और है . एक total mental  overhaul की जरुरत है . 

4 comments:

  1. केवल सुरक्षा उपायों से या सख्त सज़ाओं से बलात्कार को रोकना संभव नहीं है। सामाजिक और क़ानूनी उपायों के साथ उन नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में फिर से विश्वास जगाने की भी ज़रूरत है, जिन्हें कि आधुनिकता और विलासिता के लिए जानबूझ कर भुला दिया गया है। नैतिक और आध्यात्मिक मूल्यों में विश्वास जगाये बिना एक पवित्र और सदाचारी समाज बनाना संभव नहीं है। अफ़सोस की बात है कि हमारे समाज में पवित्रता और सदाचार को लाने के लिए वैसे प्रयास नहीं किए जा रहे हैं जैसे कि नैतिकता और सदाचार को ध्वस्त करने के लिए किए जा रहे हैं। हमारी नई नस्ल धन और संपन्नता के लिए कुछ भी कर सकती है और कर रही है। आज नशा, जुआ, नंगापन और क्राइम भी आय के साधनों में शुमार किए जाते हैं। आज ग़रीब होना पाप और अमीर का हर पाप समाज का ट्रेंड बन गया है। ईश्वर, धर्म, ऋषि-पैग़ंबरों के आदेश-निर्देश लोगों को व्यर्थ लगने लगे हैं। इसी का दंड विभिन्न तरीक़ो से हम भोग रहे हैं, जिनमें कि एक बलात्कार भी है। इसके लिए केवल केन्द्र सरकार को कोसना ही काफ़ी नहीं है क्योंकि अलग अलग पार्टी की राज्य सरकारों में बलात्कार की घटनाएं हो रही हैं। बलात्कार को मुददा बनाकर अपनी राजनीतिक भड़ास निकालने के बजाय हमें ईमानदारी से लड़कियों और महिलाओं की सुरक्षा के बारे में सोचना होगा।
    आदमी आज भी वही है जोकि वह आदिम युग में था। समय के साथ साधन बदलते हैं लेकिन प्रकृति नहीं बदलती। बुरे लोगों की बुराई से बचने के लिए अच्छे लोगों को संगठित होकर अच्छे नियमों का पालन करना ही होगा। इसके सिवाय न पहले कोई उपाय था और न आज है।ईश्वर की एक निर्धारित व्यवस्था इै, जिसका नाम सब जानते हैं। जब आदमी या औरत उससे बचकर किसी और मार्ग पर निकल जाए तो फिर वह जिस भी दलदल में धंस जाए तो उसके लिए वह ईश्वर को दोष न दे बल्कि ख़ुद को दे और कहे कि मैं ही पालनहार प्रभु के मार्गदर्शन को छोड़कर दूसरों के दर्शन और अपनी कामनाओं के पीछे चलता रहा/चलती रही।

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    1. शुक्रिया अनवर जी , आपका कमेंट बहुत ही अच्छा है . और वाकई एक बदलाव की ओर इशारा करता है .
      धन्यवाद.

      विजय

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  2. प्रिय आत्मिक मित्रो ;
    नमस्कार ;

    मुझे लगता है की जब तक हम कामवासना को नियंत्रित नहीं करेंगे और उस कामउर्जा को रामउर्जा में नहीं बदलेंगे , तक तक हमारे मन की इस कुंठा को हम नहीं निकाल पायेंगे . और ये संभव है सिर्फ नियमित प्रार्थना और ध्यान के प्रयोग से.

    ईश्वर ने हमें तथा दुसरे सारे जीवो को ये सुन्दर सा जीवन इसलिए प्रादान किया है की हम एक आपस में खुशियाँ बांटे न की इस तरह के घृणित कार्य करके समाज में इंसान की और ईश्वर की छवि को घृणित करना .

    आईये हम प्रण करे की , हम अपने बच्चो तथा परिजनों तथा अपने मित्रो को एक बेहतर इंसान बनने की प्रेरणा दे. एक दुसरे से निश्चल प्रेम करे, मित्रता करे. सहभाव रखे . यही जीवन की सुन्दरता है .

    प्रणाम

    आपका
    विजय

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