Sunday, February 19, 2017

वेदप्रकाश शर्मा




वेदप्रकाश शर्मा चले गए .
और हमारे so called महान साहित्यकारों ने उन्हें लुगदी [ pulp ] का लेखक मान कर खूब हल्ला मचाया.
जहाँ तक मैं समझता हु कि ink down is equal to literature written  फिर चाहे वो कैसे भी लिखा हो या कोई भी लिखा हो . लिखना ज्यादा  महत्वपूर्ण है . दुनिया में लिखने वाले कम है , पढ़ने वाले ज्यादा. कोई भी लिखे , उसके लेखन को सलाम करना चाहिए , उसने कुछ तो लिखा . मन के भावों को शब्द दिया . 

इन्हीं वेद प्रकाश शर्मा ,ओम प्रकाश शर्मा, इब्ने शफी , कर्नल रंजित, सुरेन्द्र मोहन पाठक इत्यादि ने हर युग के लोगों को पढ़ने की वजह दी है , और ये ज्यादा  महत्वपूर्ण है . 

और जो ज्यादा पढ़ा जाए , जो ज्यादा जाना जाए वही सच्चा और अच्छा और लोकप्रिय साहित्य है . 

मजे की बात तो ये है कि कल मैंने बहुत से पोस्ट पढ़े और उनके पढ़े जिन्हें फेसबुक के अलावा बाहर  कोई नहीं जानता . और वेद प्रकाश शर्मा ,ओम प्रकाश शर्मा, इब्ने शफी , कर्नल रंजित, सुरेन्द्र मोहन पाठक इत्यादि को दुनिया जानती है .... तो ये तथाकथित अपने आपको महान साहित्यकार समझने वाले साहित्यकार इस ऊंचाई को इस जीवनकाल में पा नहीं सकते. 

मैंने इन तथाकथित साहित्यकारों को खूब पढ़ा है और अपना माथा पीटा है . 

इसलिए इन तथाकथित साहित्यकारों से बचे . और अपनी मन की सुने और वही पढ़े , जिसमें आपका दिल लगे , चाहे वो प्रेमचंद हो , रविन्द्रनाथ हो ,वेदप्रकाश हो ,सुरेन्द्र मोहन पाठक हो , शरतचंद्र हो [ आजकल इनकी एक पुरानी कहानी पढ़ रहा हूँ . ] या कोई और हो......[ मैं भी हो सकता हूँ ....]  

बाकी इन सब so called महान साहित्यकारों से बचे ! 

आपका अपना
विजय


Friday, August 26, 2016

एक मरे हुए देश की कथा


तो हुआ यूँ कि एक मरे हुए देश में , एक जिंदा आदमी ने अपनी जिंदा पत्नी को एक सरकारी हॉस्पिटल में भर्ती किया . अब सरकारी हॉस्पिटल भी मरा हुआ ही था. सो वहाँ वो औरत भी मर गयी , अब ये जो जिंदा आदमी था , इसके पास तो खाने के भी पैसे नहीं थे . और हमारे मरे हुए देश का मरा हुआ सरकारी दवाखाना – उन्होंने इसे कोई वाहन भी नहीं दिया . तो मजबूर होकर ये बंदा अपनी पत्नी के शव को अपने कंधे पर शिव की तरह रखकर अपने गाँव चल पड़ा जो कि करीब ६० किलोमीटर दूर था . साथ में रोती हुई उसकी बेटी भी चल दी . हॉस्पिटल मरा हुआ था . वहाँ के लोग भी मरे हुए थे , और शासन तो मरा हुआ ही था. उसे कोई गाडी नहीं मिली और वो चल पड़ा !
करीब दस किलोमीटर तक वो यूँ ही शिव बन कर चलता रहा . मरे हुए लोगो ने फोटो खींचा , मरे हुए लोगो ने विडियो बनाया , मरे हुए लोग उसे चलते हुए देखते रहे . लेकिन कोई भी मदद को नहीं आया . क्योंकि या देश , या समाज और यह शासन और इस देश के लोग भी मरे हुए थे.
कुछ दूर के बाद किसी जिंदा बच्चे ने शासन में किसी अधमरे आफिसर को मरे हुए समुदाय के बीच इस जिंदा बात की खबर दी . तो उस शिव रुपी आदिवासी को अंत में गाडी मिली.
कहानी बस इतनी ही है. इस कहानी के लिए कोई मरा हुआ मीडिया सामने नहीं आया , कोई मरी हुई मोमबत्ती गैंग सामने नहीं आई , कोई बड़ी बिंदी लगाये हुए मरी हुई गैंग नहीं आई , कोई मरा हुआ पढा लिखा बंदा / बंदी  सामने नहीं आई . कोई नहीं आया.


मैंने तो पहले ही कहा है कि ये एक मरे हुए देश के मरे हुए लोगो की मरी हुई कथा है .

आगे कुछ नहीं कहना ......
विजय [ एक मरा हुआ लेखक ]
Post Script : किसी भी देश को एक देश, उस देश के लोग बनाते है. और देश को उसके लोग ही मार देते है. जब भी मैं इस तरह का कोई समाचार देखता हूँ तो बस लगता है कि मैं एक मरे हुए देश के मरे हुए समाज के , मरे हुए शासन में जी रहा हूँ [ ??? ]
इंसान को सिर्फ उसकी संवेदनशीलता और मानवता ही, इंसान बनाती है . और ये अगर नहीं रहे तो हम जानवरों से भी गए गुजरे है
अस्तु और प्रणाम

विजय [ एक जिंदा इंसान ]

Saturday, June 4, 2016

ज़िन्दगी और मैं

ज़िन्दगी और मेरे दरमियाँ एक लकीर है
लकीर के इस तरफ मैं और मेरा हुनर है ....
लकीर के उस तरफ दुनिया और दुनिया की धन दौलत है .
ज़िन्दगी और मेरे दरमियाँ, कई सालो से एक अघोषित युद्ध भी शुरू है.. 
ज़िन्दगी शायद जीत रही है, लेकिन हार तो मैं भी नहीं रहा हूँ....
कभी तो खुदा की मेहर होंगी....
कभी तो ज़िन्दगी मुझ पर अपनी खुशियों की बरसात करेंगी..
कभी तो.....
हार तो मैं मानने वाला नहीं...
विजय

Saturday, February 13, 2016

यह देश !!!

आजकल देश ऐसा हो गया है कि क्या कहे.. 
न न्यूसपेपर देखने का मन होता है न न्यूज़चैनेल देखने का मन होता है...
एक अच्छे खासे देश की कुछ लोगो ने अपना दो कौड़ी का दिमाग लगा कर ऐसी तैसी कर दी है... जहाँ देखो ... एक अजीब सा जूनून और पागलपन.......
अरे यहाँ लोगो को दो वक़्त की रोटी ठीक से कमाई नहीं जाती और ये हैै कि देश में हल्ला मचाये हुए है... और ऊपर से बड़ी बात ये कि सभी पढ़े लिखे है ......
विजय



#भारतमेरादेश , #मानवकापागलपन , #विजयकुमारसप्पत्ति , #3amwriting

Wednesday, December 16, 2015

निर्भया

निर्भया , पता नहीं तुम किस आसमान में हो...
लेकिन मैं तुम्हे बता दू कि यहाँ तुम्हारे देश में कुछ भी नहीं बदला है...
सब कुछ वैसे ही है.. आज भी बलात्कार होते ही रहते है......लोग छूट जाते है..
और तो और वो दरिंदा जिसने सबसे ज्यादा अत्याचार तुम पर किये थे.. वो भी छूट रहा है..
ये देश और इस देश का कानून .....!!!
लडकियां आज भी आदमी नाम के वहशी जानवर से डरती है..
आदमियों को आज भी लड़कियों में सिर्फ गोश्त नज़र आता है..
कहने का मतलब ये है कि देश वैसा ही है और उससे भी बदतर होते जारहा है.. जैसा तुम छोड़कर गयी थी..
और कुछ कहने के लिए न मन है और न ही शब्द....
बस .. आज मन हुआ तो तुम्हे याद कर लिया........

विजय

© विजय का 3 AM लेखन


Tuesday, December 15, 2015

..मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना !

अब शायद ये समय आ गया है कि हम अपने अपने धर्मग्रंथो को फिर से पढ़े और समझे कि दुनिया के सारे धर्मग्रन्थ सिर्फ इंसान से प्रेम करना ही सिखाते है न कि नफरत करना........

इसी बहाने से हम अपने अपने ईश्वर / खुदा पर थोडा रहम करे, क्योंकि वो कभी नहीं चाहता है कि हम आपस में झगडे और उसके नाम पर मर मिटे और एक दुसरे को मारे .......
इकबाल ने कहा है......मज़हब नहीं सिखाता आपस में बैर करना !!!
अमीन
© विजय का 3 AM लेखन

Monday, December 14, 2015

प्यार , पैसा और ज़िन्दगी

कभी प्यार मिल जाता है
कभी पैसा मिल जाता है
और कभी कभी तो ज़िन्दगी भी मिल जाती है. ......
,,,,,पर तीनो का मिलना असंभव और दुर्लभ है !
© विजय का 3 AM लेखन

Tuesday, December 8, 2015

हे दुनिया के लोगो ,

हे दुनिया के लोगो ,
जिस दुनिया को हमने बनाया है और जब हम सब एक है तो तुम सब अलग अलग कैसे हो सकते हो . कौन सा धर्म और मज़हब......
हमने तो इंसान बनाकर दुनिया में तुम्हे भेजा था तुम हिन्दू, मुस्लिम, सिख, इसाई और पता नहीं क्या क्या हो गए हो....
एक बार फिर से इंसान बनकर तो देखो...
हम तुममे में ही है......
© विजय का 3 AM लेखन

Sunday, December 6, 2015

सपने और ज़िन्दगी

कुछ सपने है जो मेरा पीछा नहीं छोड़ते है
और कुछ सपने है जिनका पीछा मैं नहीं छोड़ता हूँ.
पुराने सपने जीने नहीं देते है
और नये सपने मरने नहीं देते है
और ज़िन्दगी कहती है.....यार मेरे, मैं भी तो तेरा एक सपना हूँ, आ सांस ले ले ज़रा.
© विजय का 3 AM लेखन

Tuesday, September 22, 2015

प्रेम

प्रेम एक अंतहीन यात्रा और प्रतीक्षा ही तो है .....जो इस प्रतीक्षा को जी जाते है और यात्रा को पूरी करते है ; वो दुनिया से हार जाते है. और जो दुनिया से जीत जाते है वो क्या जाने कि प्रेम क्या है और उसकी यात्रा और प्रतीक्षा क्या है........!!!!
© विजय

Friday, September 11, 2015

प्रेमपत्र नंबर : ७८६ :

मुझे लिखना अच्छा लगता है. और ख़ास कर तुम्हे लिखना. और जब मैं तुम्हे लिखता हूँ तो बस सिर्फ तुम ही तो होती हो. और दूसरा कोई हो भी नहीं सकता न. मैं तुममे मौजूद स्त्री के प्रेम में हूँ और जब मैं उस स्त्री के प्रेम मे होता हूँ जो कि तुम हो तो मेरी कोई और दुनिया नहीं होती है. और सच कहूँ तो हो भी नहीं सकती ! और जब तुम, तुममे मौजूद स्त्री और उस स्त्री में मौजूद प्रेम जो कि शायद मेरे लिए ही मौजूद होते है तब मैं लिखता हूँ अक्षर, प्रेम, कविता , कथा और ज़िन्दगी ! © विजय

Wednesday, September 9, 2015

I , Me, Myself ...............!!!

I want to leave this world in this mood only ...
smiling . laughing . talking . caring .loving .
and of course living each moment blessed by GOD .
vijay


Thursday, September 3, 2015

Human race !

.......and one day GOD created humans and it was his last mistake !

and immediately humans started spoiling and killing his other creations .
humans killed environment , killed all types of animals , killed people over petty issues of land and money and woman , fought wars, killed own parents, brothers and sisters and finally started killing own kids ....!

GOD is still regretting of creating humans and I sometimes feel ashamed of being a part of human race ............!!!

what are we leaving behind for our children and grandchildren and coming generations !!!!

I lost words sometimes to express my grief and anguish over the acts of my fellow humans !

GOD ....is there a way to make them real humans !

vijay


Monday, August 31, 2015

कितना बदल गया इंसान !

जो लोग किसी भी कारणवश अपने बच्चो की हत्या करते है [ चाहे वो फॅमिली प्राइड हो, चाहे प्यार हो, चाहे पैसा हो, चाहे हॉनर किलिंग हो. चाहे कोई भी कारण हो - जो सिर्फ और सिर्फ आदमी के स्वार्थ और क्रोध और भय और कुंठा की वजह से जन्मता है ] ; उन्हें इंडियागेट पर खुले आम फांसी दे देना चाहिए !
-- विजय का गुस्सा !

Monday, August 17, 2015

अम्मा

......मैंने पहले बोलना सीखा ...अम्मा... !

फिर लिखना सीखा.... क ख ग a b c 1 2 3 ...
फिर शब्द बुने !
फिर भाव भरे !

.... मैं अब कविता गुनता हूँ  , कहानी गड़ता हूँ ..
जिन्हें दुनिया पढ़ती है ..खो जाती है .. रोती है ... मुस्कराती है ...हंसती है ..चिल्लाती है ...
.....मुझे इनाम ,सम्मान , पुरस्कार से अनुग्रहित करती है ...!

.....और मैं किसी अँधेरे कोने में बैठकर,
....खुदा के सजदे में झुककर ,
धीमे से बोलता हूँ ...अम्मा !!!

विजय

Thursday, January 22, 2015

पिताजी की स्मृति में...................


दोस्तों, आज पिताजी को गुजरे एक माह हो गए.

इस एक माह में मुझे कभी भी नहीं लगा कि वो नहीं है. हर दिन बस ऐसे ही लगा कि वो गाँव में है और अभी मैं मिलकर आया हूँ और फिर से मिलने जाना है. कहीं भी उनकी कमी नहीं लगी. यहाँ तक कि संक्रांति की पूजा में भी ऐसा लगा कि वो है. बस कल अचानक लगा कि फ़ोन पर उनसे बात करू तो डायल कर बैठा और सिर्फ फ़ोन की घंटी बजती रही. बहुत देर तक..............कोई उसे उठाने वाला नहीं था !

आज सोचा कि पिताजी की स्मृति पर कुछ लिखू.

पिताजी ने बहुत बरस पहले हमारे गाँव को रोजगार के लिए छोड़ दिया था. कलकत्ता में कुछ दिन रहे फिर नागपुर में आकर बसे. वही पर हम तीनो भाई बहनों का जन्म हुआ. और फिर हमारी पढाई नौकरी इत्यादि भी वही की शुरुवात है. पिताजी ने गाँव भले ही छोड़ा हो, लेकिन जैसे कि होता है, गाँव ने उन्हें और हमें नहीं छोड़ा. हम भी यदा-कदा गाँव जाते रहे. लेकिन गाँव में कुछ भी नहीं रहा था !

पिताजी की ज़िन्दगी में पांच टर्निंग पॉइंट आये. [१] उनकी नागपुर में नौकरी. [२] मेरा इंजिनियर बन जाना. [३] मेरी माँ की मृत्यु और [४] मेरी बहन की शादी. और फिर एक सबसे बड़ा और पांचवा टर्निंग पॉइंट आया. मेरी बेटी का जन्म, बस वो उसी में रम गए. हम सब एक तरफ और वो और मेरी बेटी एक तरफ. ज़िन्दगी बस गुजरती रही. और फिर इन सब के बाद, बहुत बरसो के बाद, जब हम तीनो भाई बहन धीरे धीरे जमने लगे अपनी ही अलग अलग दुनिया में तो वो कभी गाँव में रहते, कभी हम तीनो के पास रहते. उनकी ज़िन्दगी कुछ इसी तरह से गुजरती रही.

फिर मैंने अपने गाँव के टूटे फूटे घर को थोडा अच्छा बनवा दिया ताकि वो और मेरे ताऊ जी अच्छे से रह सके. ज़िन्दगी अच्छे से बस गुजरती रही.

उनके और हमारे परिवार के अन्य सदस्यों के दो पीढी के जेनेरेशन गैप में कई बाते कभी पसंद की गयी और कई बाते नापसंद की गयी. कुछ आदतों और बातो को स्वीकार किया गया, कुछ पर आपत्ति उठायी गयी. लेकिन मैं हमेशा उनके साथ रहा, भले ही उनकी कुछ बातो से मुझे मेरी विचारधारा नहीं मिलती थी. कई बार मेरा और उनका कई बातो पर विरोध हुआ. और फिर बाद में patch-up भी होता रहा. लेकिन फिर भी मेरे लिए पिता ही थे. और अंत तक रहे.

उनकी जब भी तबियत ख़राब होती, मैं या मेरा छोटा भाई हमेशा उनके पास होते. मेरे छोटे भाई ने भी उनकी बहुत सेवा की.उनके साथ होते. उनका बेहतर से बेहतर इलाज होता और फिर कुछ दिन साथ में गुजारने के बाद फिर गाँव में रहने जाते. जिस गाँव से वो वो सब कुछ खोकर बाहर निकले थे, हम ने उस गाँव को उन्हें वापस दिया था. घर और दूसरी सारी सुविधाओं के साथ !

और वो खुश ही थे. मुझसे हमेशा ही कहते रहते थे की तू इतना अच्छा क्यों है, तू हर जनम मेरा बेटा ही बनना. ऐसे ही प्रेम और अनुराग की बहुत सी बाते. और मैं बस मुस्करा देता था. वो अक्सर मुझसे अपनी की गयी गलतियों के बारे में भी दुखी होकर कहते, जिस पर मेरा कुछ विरोध रहा. लेकिन ये तो ज़िन्दगी है, बस इसे ऐसे ही गुजरना होता है. कभी ख़ुशी, कभी गम, कभी सही तो कभी गलत !

करीब ९-१० साल पहले जब मैंने अपने आपको ज़िन्दगी के एक नए आयाम स्पिरिचुअल डाईमेंशन में परावर्तित किया तो उन्हें बहुत आश्चर्य हुआ और ख़ुशी भी. और मुझसे कहते रहते कि तू जहाँ पहुंचा है वहां हममें से कोई नहीं पहुंचा. मैं मुस्कराकर कहता, आप सभी न होते तो मैं भी नहीं होता. बस ऐसे ही बातो से जीवन गुजर रहा था.

मैंने अपनी माँ को बहुत चाहा,अब भी चाहता हूँ, मुझे लगता है कि दुनिया में कोई और इंसान कभी भी मुझे मेरी माँ की तरह प्रेम नहीं कर सकेंगा. लेकिन मेरे पिताजी भी मुझे बहुत चाहते थे. मेरे स्वभाव में उन्हें मेरी माँ नज़र आती थी. जो क्षमा की देवी थी !

करीब ७ महीने पहले उनके एक रूटीन चेकअप के दौरान पता चला कि उन्हें liver cancer – terminal stage पर है. हम सब को एक आघात सा लगा. मैंने करीब ४ हॉस्पिटल में उन्हें दिखाया. पर सभी डॉक्टर्स ने एक ही बात कही की अब ज्यादा समय नहीं रहा है, मुश्किल से ६ महीने !

मेरे पिताजी को इस समाचार पर विश्वास नहीं हुआ. मैंने उनसे बैठकर बात की, उनसे कहा कि ये सच है. लेकिन अब इससे भी बड़ी बात ये है कि आपको पूरी तरह से जीना है और अपने जीवन के अंत को स्वीकार करना है. ये सब बाते उनके लिए मुश्किल थी. वो समझ नहीं पा रहे थे. उनके पैर में एक घाव हो गया था, मैं उसकी ड्रेसिंग करता, उन्हें दवाई देता और उनसे ढेर सारी बाते करते रहता. लेकिन जैसे ही मैं कुछ देर के लिए उनसे अलग होता वो अपने एकांत में चले जाते. वो अपने जीवन के इस तरह के अंत को स्वीकार नहीं कर पा रहे थे.

फिर एक दिन मैंने उनसे पूछा कि वो कहाँ से जीवन को विदा कहना चाहते है, मेरे घर से या छोटे भाई के घर से या गाँव से. उन्होंने सोचकर कहा कि वो गाँव से ही विदा होना चाहते है क्योंकि वो वही पैदा हुए, वही बड़े हुए, वही पर शुरुवाती रोजगार किया और वही उनका ब्याह हुआ, वही पर से वो नागपुर पहुंचे और फिर अब वो वही से, अपने गाँव से विदा होना पसंद करेंगे.

मैंने गाँव में सारी व्यवस्था की. और उन्हें गाँव में लेकर गया. मैंने हर १० दिन में गाँव जाता,हफ्ता भर रहता जाता, उनके साथ वक़्त बिताता. मैंने दवाई और खाने पीने की सारी व्यवस्था कर दी. धीरे धीरे मेरा भी गाँव से एक रिश्ता बन गया. मैंने पिताजी के साथ बहुत देर तक बैठकर बहुत सी बाते करता.

धीरे धीरे मैंने उन्हें मृत्यु को प्रेम से और आनंद से स्वीकार करने के लिए तैयार कर दिया. अब वो सहज हो चुके थे. मैंने उन्हें बहुत सी कहानियाँ बतायी. लेकिन मृत्यु से शायद सभी को डर लगता ही है. उन्हें समय लगा सहज होने के लिए और मेरी ही सोच पर उतर कर जीने के लिए !

ज़िन्दगी अब जैसे रिवर्स गियर में चल रही थी. जैसे उन्होंने मुझे बड़ा किया था वैसे ही अब मैं उनके साथ कर रहा था. मैं उन्हें खिलाता. मैं उन्हें चलाता, मैं कहानी बताता, उनकी ड्रेसिंग करता, उनके कपडे बदलता, उनका मल-मूत्र साफ़ करता. उन्हें अपने साथ लेकर चलाता. उनकी खूब सेवा की.

मैंने उनसे कहा कि जैसे उन्होंने जीवन को स्वीकार किया है, वैसे ही वो मृत्यु को भी स्वीकार करे. जो हो गया वो हो गया. जो बीत गया वो बीत गया. उन्होंने एक भरा पूरा जीवन जिया है. एक परिवार, एक ज़िन्दगी. सब कुछ तो जी लिया है. अब किसी भी बात से उन्हें व्यथित नहीं होना चाहिए.

मैंने उनसे एक बार कहा, हो सकता हो की जीवन की इस आपाधापी  में इतने बरसो में कभी मुझसे कोई गलती हुई हो, तो वो मुझे माफ़ जरुर करे. क्योंकि ये ज़िन्दगी तो बहुत सी घटनाओ का ही जमा-पूँजी होती है.तो उन्होंने कहा कि मुझसे कभी भी कोई गलती नहीं हुई और उन्होंने मुझे ढेर सारा आशीर्वाद दिया था.

उनके लिए अंतिम दिनों में मैं उनका पुत्र ही नहीं बल्कि उनका दोस्त, उनकी माँ, उनका भाई, उनका सन्यासी गुरु बन गया था जो कि उनसे जीवन के अंत को स्वीकार करने की कला को जानने के बारे में कहता था.

और फिर इसी तरह से पिछले साल के ६ महीने गुजरे और उन्होंने २२ दिसंबर २०१४ को सुबह ५ बजे अंतिम सांस ली !

जैसे एक युग का ही अंत हुआ हो, पर मुझे तो अब भी वो करीब ही है ऐसा ही लगता है, कोई कमी नहीं महसूस होती है. वो अक्सर मुझसे कहते थे, विजया [ उन्होंने मुझे कभी विजय नहीं कहा, बस हमेशा विजया ही कहा, माँ भी विजया ही कहती थी ] तू हमेशा इतना शांत कैसे रह सकता है, इतनी मुश्किल में भी हँसना, ये तो बहुत कठिन है मैं उनसे कहता, यही सबसे आसान है इसी तरह से जीना है. और इसे ही जीवन कहते है. वो मुझे बहुत सा आशीर्वाद देते और मैं बस मुस्करा देता.

आज वो शरीर रूप में नहीं है, लेकिन उनका प्रेम और उनका आशीर्वाद हमेशा ही मेरे साथ है.

उनको नमन और श्रद्धांजलि.

विजय 

[ फोटो में मेरे पिताजी , मेरे बच्चो के साथ ]

Sunday, August 31, 2014

अमृता प्रीतम

कई बाते ऐसी होती हैं की उन्हें लफ्जो की सजा नहीं देनी चाहिए...
~

अमृता प्रीतम

अमृता , यदि आप न होती तो मेरी मुलाकात लफ्जों से नहीं होती. और न ही मैं आज कवि या कहानीकार होता . मेरे अलफ़ाज़ भी बस आपके ही कलम के हमसाया है . एक मुलाकात जो आपसे की है वो बस इस जन्म के लिए बहुत कुछ है . जन्मदिन मुबारका जी...!



Saturday, August 23, 2014

||| यौन अपराध के विरुद्ध एक मोर्चा – भाग तीन ||

||| यौन अपराध के विरुद्ध एक मोर्चा – भाग तीन ||

दोस्तों , 

भारत में रेप और यौन अपराध स्त्रियों के प्रति सबसे बड़ा घटित होने वाला अपराध है . national Crime Record Bureau के अनुसार २०१० के मुकाबले १.७ गुना और बाद गए है . भारत में हर २० मिनट में कहीं न कहीं , किसी न किसी से बलात्कार होता है . इनमे से १४ में से एक की उम्र १० साल से कम होती है और १८ में से एक की उम्र ३ वर्ष से कम ! ये एक घृणा करने योग्य आंकड़े है . दिल्ली हमारी राजधानी ही नहीं बल्कि हमारी रेप कैपिटल भी है . यहाँहर १८ घंटे में एक रेप केस को रिपोर्ट किया जाता है [ ज़रा सोचिये उन आंकड़ो पर जो की दर्ज ही नहीं किये जाते है ]

इस पर भी गौर करिए . २००९ -२०११ के दरमियान करीब ६८००० रेप केसेस दर्ज हुए और दोषी सिर्फ १६००० को माना गया और उन्हें भी पूरी तरह से सजा नहीं हुई है

आज मैं आपसे उन कारणों पर चर्चा करूँगा , जो कि यौन अपराध को बढ़ावा देते है . इनमे सबसे प्रमुख है . हम सभी का चुप रहना , क्योंकि भारतीय समाज का ढांचा कुछ इस तरह का है कि लडकियों को चुप ही रहना सीखाया जाता है ताकि बदनामी न हो और उनकी यही चुप्पी और कभी कभी उनके परिवार की चुप्पी इन यौन अपराधियों को बढ़ावा देते है . इसके अलावा कुछ और मुख्य कारण है जो कि नीचे दिए गए है

१. सबसे बड़ा एक और कारण है वो है इन्टरनेट का पोर्न मटेरियल एक्सपोज़र , इसने सभी को जकड कर रखा हुआ है , हर generation इसके चपेट में है और स्वाभाविक रूप से ये इंसान की विकृति को दमित करते हुए बढ़ावा ही देती है.
२. विज्ञापन में स्त्रियों को provative रूप से दिखाना . मुझे तो ये समझ में नहीं आता कि आदमी की वस्तुओ के लिए औरतो को क्यों विज्ञापित किया जाता है , आप कोई भी विज्ञापन देख लीजिये , बस स्त्रियाँ ही दिखेंगी . और निश्चिंत रूप से वो सारे डायरेक्टर जो इन्हें डायरेक्ट करते हिया वो भी यौन अपराधी ही है . और मेरी अपनी राय ये भी है कि अगर स्त्री मॉडल्स चाहे तो ऐसे provactive advertisements में हिस्सा न ले , क्योंकि इस तरह से वो अपने ही खिलाफ यौन अपराधियों को जन्म दे रही है . लेकिन दुर्भाग्य से जीविका कमाने के चक्कर में ये मॉडल्स ये advertisement करती है और अनचाहे ही ऐसी घटनाओ का कारण बनती है , क्योंकि यही advertisements बाद में ऐसे अपराधो के लिए ट्रिगर का काम करती है .
३. फिल्मो में दिखाए जाने वाले आइटम सांग्स और स्त्रियों को मुक्तता के नाम पर vulgarity के साथ पेश करना . सिनेमा , मनोरंजन के नाम पर सबसे बड़ा माध्यम है और अगर इसे और इसमें मौजूद स्त्री के चरित्र को ठीक से पेश न किया जाए तो ये युवाओं पर एक ऐसा इम्प्रैशन डालता है जिससे उनके मन में औरतो को लेकर कुत्सित भावनाए ही उपजेंगी .
४. और मीडिया , इसका क्या किया जाए कुछ समझ में नहीं आता है . इसका काम क्या है और ये दिखाता क्या है , किस बात को लेकर कितना दिखाना चाहिए , ये इस मीडिया को ही नहीं पता है . इतने सारे टीवी चैनेल्स में जब भी कुछ इस तरह के सीरियल या विडियो दिखाए जाए तो थोडा संयम दर्शाना चाहिए .बीच में मैंने MTV पर कुछ serials देखे , मुझे तो आश्चर्य हुआ कि सरकार ने इसे पास/क्लियर कैसे किया . यही सब आज का युवा देखता है और उलटी बंसी ही सीखता है .
५. हमारे देश की न्याय प्रक्रिया इतनी धीमे है कि बस पूछिए मत . और ऊपर से गवाहों को और धमकाया जाता है . मतलब कि अगर कोई यौन अपराध का केस हुआ भी तो उस पर न्याय कब मिलेंगा , ये भगवान् को ही पता है . इसी न्याय प्रणाली के धीमेपन के कारण , जिनपर जुल्म हुआ है उन्हें न्याय नहीं मिल पाता है और समाज का दोगलापन अलग से सहना पड़ता है .
६. कुत्सित मानसिकता का पहला बहाना होता है कि स्त्रीयां कम कपडे पहनती है .इसलिए यौन अपराध ज्यादा होते है . मेरे पास कुछ statistics है जो ये बताते है कि दुनिया में स्त्रीयों के खिलाफ यौन अपराध सबसे ज्यादा वही होते है, जहाँ स्त्रीयां सबसे ज्यादा कपडे पहनती है . यहाँ तक कि भारत में भी अगर देखा जाए तो गोवा में सबसे कम बलात्कार होते है , जबकि वहां पर स्त्रीयां [ specially in GOA, औरते का पहनावा और जगह से कम ही होता है ] लेकिन दिल्ली , बंगलौर ,मुंबई के आंकड़े देखिये . दिल्ली में १४४१, मुंबई में ८० , बंगलौर में ३९१ [ रिपोर्ट २०१३ ]
७. भारत में २००१ में करीब १६०७५ बलात्कार हुए और २०१० में २२१७२ बलात्कार!
यानी कि घटनाएं बड़ी ही हुई है , कम नहीं हुई है . इसका मतलब ये है कि इन अपराधियों की संख्या में बहुत बड़ा इजाफा हुआ है . कपडे कम पहनना कोई कारण नहीं है.
८. औरतो का चुप रहना , सहते जाना , चाहे वो घर में हो या समाज में या ऑफिस में . जब तक ये खुल कर हल्ला नहीं बोलेंगी ये अपराध होते ही रहेंगे और इन यौन अपराधियों में वृद्धि होती ही रहेंगी . स्त्रीयों को ये समझना होंगा कि सहना भी एक अपराध ही है . जो आज उनके साथ हुआ है वो कल किसी और बहन या बेटी या बहु के साथ भी हो सकता है .
९. Rapes happen because some men are insecure, afraid of being rejected or deserted by the woman and they need to feel in control of the woman - so they rape. Rapes also happen because they've been allowed to go unpunished for thier crimes
१०. जागिये और सजग रहिये .
११. अब मैं आप लोगो के साथ कुछ statistics शेयर करना चाहता हूँ . जो मुझे मेरी रिसर्च के दौरान मिले है . आपको ये आंकड़े चौंका देंगे और शायद कुछ बातो से आपको आगाह भी करे !

||| रेपिस्ट आपके पहचान का व्यक्ति हो सकता है |||

जो आंकड़े इस संदर्भ में मेरे पास है . उससे पता चलता है कि ९८ % केसेस में रेपिस्ट विक्टिम को जानता था . जानकरी के लिए बता दूं . २०१२ में करीब २४९२३ केसेस रेप के हुए और इनमे करीब २४४७० केसेस में रेप करने वाला व्यक्ति या तो रिश्तेदार था या फिर पडोसी ! याद रखिये रेप करने वाला व्यक्ति कोई नकाब लगाए अनजान आदमी नहीं होता है .
कुछ और आंकड़े !
Approximately 2/3 of rapes were committed by someone known to the victim.
73% of sexual assaults were perpetrated by a non-stranger.
38% of rapists are a friend or acquaintance.
28% are an intimate.
7% are a relative.

||| रेप करने वाला व्यक्ति झाड़ियो में छुपा हुआ नहीं है |||

More than 50% of all rape/sexual assault incidents were reported by victims to have occurred within 1 mile of their home or at their home.
• 4 in 10 take place at the victim's home.
• 2 in 10 take place at the home of a friend, neighbor, or relative.
• 1 in 12 takes place in a parking garage.
• More than half of all rape/sexual assault incidents were reported by victims to have occurred within one mile of their home or at their home.

||| अँधेरा इन अपराधियों के लिए बहुत बड़ा सहारा होता है . ये आंकड़े देखिये |||

• 43% of rapes occur between 6:00pm and midnight.
• 24% occur between midnight and 6:00am.
• The other 33% take place between 6:00am and 6:00pm.
• 43% of rapes occur between 6 pm and midnight. 24% occur between midnight and 6am. The other 33% take place between 6am and 6pm.

||| The Dangers of Youth |||

• 15% of victims are under age 12
29% are age 12-17
44% are under age 18
80% are under age 30
• Age 12-34 are the highest risk years. Risk peaks in the late teens: girls 16 to 19 are four times more likely than the general population to be victims of rape, attempted rape or sexual assault. (NCVS, 2000)

||| अब आप अपने क्रिमिनल को जानिए |||

• The average age of a rapist is 35 years old.
• 22% of imprisoned rapists report that they are married.
• Juveniles accounted for 16% of forcible rape arrestees in 1995 and 17% of those arrested for other sex offenses.
• In 1 in 3 sexual assaults, the perpetrator was intoxicated — 30% with alcohol, 4% with drugs.
• In 2001, 11% of rapes involved the use of a weapon — 3% used a gun, 6% used a knife, and 2 % used another form of weapon.
• 84% of victims reported the use of physical force only.
• Rapists are more likely to be a serial criminal than a serial rapist.
• 46% of rapists who were released from prison were re-arrested within 3 years of their release for another crime.

||| 15 of 16 Rapists Will Walk Free |||

• 61% of rapes/sexual assaults are not reported to the police. Those rapists, of course, never serve a day in prison.
• If the rape is reported to police, there is a 50.8% chance that an arrest will be made.
• If an arrest is made, there is an 80% chance of prosecution. If there is a prosecution, there is a 58% chance of a felony conviction.
• If there is a felony conviction, there is a 69% chance the convict will spend time in jail.
• So, even in those 39% of rapes that are reported to police, there is only a 16.3% chance the rapist will end up in prison.
• Factoring in unreported rapes, about 6% - 1 out of 16 - of rapists will ever spend a day in jail. 15 out of 16 will walk free.

||| Why do men rape women (Rape psychology) |||

अब मैं आपको रेप सायकोलोजी पर कुछ पढवाना चाहता हूँ . ये जानना बहुत जरुरी है कि क्यों इन क्रिमिनल्स के व्यवहार में बदलाव आता है

Each human behavior doesn't map to a single psychological need but instead the same behaviour could appear because of many different psychological needs. In other words 10 rapers could rape for 10 different reasons. Below are some of the most common psychological drives behind rape:

• Dealing with rejection: What does rejection has to do with rape? one of the reasons a man could rape a woman is to make up for the rejection he felt earlier by the opposite sex. By overpowering someone from the opposite sex the man can feel relieved of the shame of rejection. You might be wondering why a man who was rejected by a woman rapes another one but when you know that the subconscious mind believes that people who share certain similarities are the same person then everything will become clear. You might fall in love with a woman just because she looks like a woman you loved before and the same goes for rape. A man can rape a woman just because she resembles a woman who rejected him earlier.

• Feeling superior to women: All men want to feel superior to women but some of them fall prey to low self confidence issues which forces them to believe that they are inferior to women. In such a case the shame becomes unbearable and those men start to find another way to feel superior. Sane men will usually find a healthy path to gain superiority such as building self confidence or succeeding in life while other men who are too scared to do this might start taking a short cut,which is raping women, to feel superior.

• Expression of power: The media teaches people indirectly that men are superior to women because of their ability to dominate them sexually. Because of these advertised beliefs some men start to seek that kind of domination in order to feel more manly. In other words some men rape women in order to assert their manhood especially if they had doubts about their own masculinity (see also How psychological identities affect behaviour).

• Revenge: Some men rape women in order to take revenge from that specific woman, from a woman who resembles her or from women in general. Lets suppose that a man had a very tough boss who happened to be a woman. In such a case that man will feel ashamed because his manhood is threatened by a woman and as a result he might feel like wanting to rape a woman who resembles her in order to feel good (see also How your past affects your present). Some people wonder why do some men rape old women who are above 60 or even 70 but when they know that the raper picks a target who resembles someone he already knows then the mystery will disappear.

• Compensation: some men don't have a good social life and aren't any lucky when it comes to dating. Those men are put under pressure by their peers and as a result they start to experience shame. Some of those men start to become rapers in order to compensate for the lack of intimacy in their social lives

• Regaining control: people who lack control over their own lives try to exert control over the less powerful ones they know. If a man felt he is not in control of his life and he wasn't brave enough to regain that control in a socially acceptable way then he might become a raper just to overpower a helpless victim and so feel in control

मुझे विश्वास है कि ये सीरिज आपके काम आ रही है . कुछ जाग्रुतता आपको एक बहुत बड़ी घटना से बचा सकती है . अगले भाग में बलात्कार की घटना से कैसे निपटे , इस पर कुछ जानकारी दूंगा !
दोस्तों , यौन अपराध , समाज पर एक नासूर है , आईये एक जागृतता अपने आसपास फैलाए .

आईये मिलकर एक कोशिश करे.

धन्यवाद
आपका
विजय




Sunday, August 3, 2014

||| यौन अपराध के विरुद्ध एक मोर्चा – भाग दो |||



दोस्तों ,

मैंने पिछली पोस्ट में आपसे कहा था कि मैं इस सीरीज में बहुत से बातो पर चर्चा करूँगा और उन पर आपकी राय भी चाहूँगा . आज के दुसरे भाग में मैं कुछ बुनियादी बाते आपके साथ शेयर करना चाहता हूँ . 

पहली बात तो ये है कि अगर हम ये समझते है कि नीचे लिखी इन बातो/ actions से हम यौन अपराध दूर कर देंगे तो ये हमारी सबसे बड़ी गलत सोच है और वो बाते है – 

१. सोशल नेटवर्किंग साइट्स जैसे फेसबुक पर इस विषय पर कविता, कहानी लिख लेना .
२. ट्विटर या दुसरे micro blogging sites पर इन अपराधो के ऊपर ट्वीट / न्यूज़ शेयर कर देना 
३. कैंडल मार्च या दुसरे जुलुस निकाल कर हो हल्ला करना 
४. अखबारों और दुसरे मीडिया मीडियम पर चीखना चिल्लाना 
५. इस विषय पर सरकार को या सरकारी मशीनरी को ही पूरी तरह से दोषी मानना 
६. इस विषय पर बाते और बाते और सिर्फ बाते ही करना 
७. ड्रिंक्स टेबल या डिनर टेबल पर दोषियों को गाली देकर कर शांत हो जाना 
८. इत्यादि .....!

मैं ये मानता हूँ कि हम में से बहुत से लोग इन बातो से अपने मन की कहते है और करते है . लेकिन मैं ऊपर लिखी बातो को सिर्फ अपने आक्रोश या अपने मन की कुंठित व्यथा को व्यक्त करने  का एक तरीका ही मानता हूँ . क्योंकि मेरे रिसर्च के दौरान मुझे कुछ बातो का पता चला है जिससे ये साबित होता है कि इन सब बातो से यौन अपराध नहीं रुकते . उन्हें रोकने के लिए ये एक शुरुवात मानी जा सकती है लेकिन इन सबसे यौन अपराध नहीं रुकेंगे . 
आप जानना चाहेंगे क्यों ? 

क्योंकि यौन अपराध करने के लिए चार बाते मुख्य रूप से जरुरी होती है और वो है : 
१. अवसर या मौका मिलना 
२. एकांत 
३. सुप्त, ,कुंठित, दमित वासनाये और unfulfilled sexual desires और conditioned temptations 
४. और एक ट्रिगर वर्क जो कि अवसर मिलते ही इन कुंठित और दमित वासनाओ को ट्रिगर करे और अपराधी tempt होकर act और react करे. और यौन अपराधो को अंजाम दे 

इसमें ट्रिगर वर्क बहुत महत्वपूर्ण है और इसके लिए जो कारक है वो है शराब का नशा , porn materials के after effects , और conditioned temptations को रिलीज़ करने का रास्ता दिखाई दे . 

conditioned temptations वो होते है जो फिल्मो , विज्ञापन , item songs , porn materials, internet exposure और मीडिया के द्वारा लगातार अपराधी के मन को condition किये होते है .
अवसर का सबसे ज्यादा फायदा वो यौन अपराधी उठाते है जो , मासूम बच्चो के साथ यौन अपराध करते है  

यौन अपराधी दो तरह के होते है , एक instant action वाले और दुसरे plan करके अपराध करने वाले . वैसे तो दोनों के लिए ये जिस्मी भूख को शांत करने का ज़रिये है , लेकिन इंस्टेंट एक्शन के बदले में प्लान करने वाले ज्यादा खतरनाक होते है . और दरिन्दिगी के मामले में इंस्टेंट एक्शन वाले अपराधी ज्यादा खतरनाक होते है . और मैं दोनों से ही नफरत करता हूँ . 

एक और बात आपको बताऊँ तो आप हैरान हो जायेंगे . यौन अपराध करने वालो में पढ़े लिखो की संख्या ज्यादा होती है . अनपढ़ के पास कोई कंडीशनिंग नहीं होती है , पर पढ़े लिखे, शानदार और धनवान लोग , यौन अपराध ज्यादा करते है . वो प्लान करते है और विक्टिम को या तो मजबूर करके या परेशान करके या तबाह करके अपने कुत्सित इरादों को पूरा करते है . 

देश में फैली गरीबी, मज़बूरी, अनपढ़ता इत्यादि वो दूसरी महत्वपूर्ण बाते है जिसका फायदा लोग उठाते है और यौन अपराध करते है .

और तो और मैं उन सारे बंधुओ को यौन अपराधी मानता हूँ जो फेसबुक पर स्त्रियों के फोटोज को ज्यादा like करते है और उनके स्टेटस पर ज्यादा कमेंट करते है . ये सब सिर्फ और सिर्फ उनकी सुप्त और दमित वासनाओ का ही outcome होता है  . मेरी नज़र में नए generation के वो सारे महान so called  साहित्यकार भी यौन अपराधी है जो अपनी कहनियो में adult content ज्यादा डालते है और वो संपादक और प्रकाशक भी यौन अपराधी है जो स्त्री लेखको पर ज्यादा मेहरबान होते है . और हाँ वो सारे पति भी , जो अपनी पत्नी की मर्जी न होते हुए भी उनसे संबध बनाते है . वो भी अपराधी ही है .

आप सभी इनके अलावा उन बहुत से पुरुषो और ऐसे संबंधो को जानते होंगे जो / जिसमे यौन अपराधी मौजूद है, और जिन्होंने आपकी जान को हलकान किया रखा है :

१. चाहे वो फिर बस / ट्रेन का हमसफ़र हो 
२. चाहे वो आपका टेलर / दर्जी या undergarments को बेचने वाला दूकानदार  हो 
३. चाहे वो आपके दूर और नजदीक के रिश्तेदारी में हो 
४. चाहे वो आपके दोस्त / प्रेमी के रूप में छुपा हुआ हो 
५. चाहे वो घर का ड्राईवर /नौकर हो 
६. चाहे वो आपका बॉस या साथ में काम करने वाला colleague हो 
७. चाहे वो कोई अजनबी हो जो आपको stalk कर रहा हो 
८. मतलब ये कि ये यौन अपराधी आपको हर जगह मिल जायेंगे , चाहे वो घर में क्यों न हो या फिर पड़ोस में , ऑफिस में , समाज में , हर जगह ये है . इनसे सावधान रहे 

अब जब मैं इन सब statistics को पढता हूँ तो एक सवाल जेहन में आता है , क्या हम सब यौन अपराधी है ?  मैंने अपनी रिसर्च से परेशान होकर कुछ और किताबे पढ़ी और कुछ मनोविज्ञान के डॉक्टर्स से बात की. जो outcome आया वो कुछ इस तरह से है . this is really a bitter truth that we all are criminals somewhere in our subconscious or unconscious mind  ! More than 60% people kill those negative emotions in the beginning, out of balance people some 30% keep those emotions in their unconscious mind, which they hardly get opportunity to release outside their own life framework. But sometimes they release these conditioned emotions with their wives, lovers! The last balances 10% are the real criminals who commit these sexual crimes. They keep these emotions in their subconscious mind and as & when time and opportunity comes, they act on those emotions and do these crimes. 

आप लोगो की राय और चर्चा का स्वागत है . जल्दी ही मिलता हूँ अगले भाग के साथ , अगले भाग में मैं बलात्कार  पर चौंका देने वाले statistics पेश करूँगा . 

दोस्तों , यौन अपराध , समाज पर एक नासूर है , आईये एक जागृतता अपने आसपास फैलाए . इस नासूर को दूर करे. 

आईये मिलकर एक कोशिश करे. 

धन्यवाद 
आपका 
विजय